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यूपी की राजनीति में कब क्या हो जाए? कुछ कहा नहीं जा सकता. यहां चाय की टपरी से लेकर नेताओं के ड्राइंग रूम तक हर जगह बस एक ही चीज चलती है.. और वो है सियासत. जब बात गोरखपुर की हो.. तो हलचल होना तय है. हाल ही में केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री कमलेश पासवान के गोरखपुर वाले घर पर कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला. जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी. उनके गोरखपुर के आवास पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की अचानक मौजूदगी ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, यूपी भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी का एक साथ कमलेश पासवान के घर पहुंचना कोई मामूली बात नहीं है. अब राजनीतिक पंडित यही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने एक बेहद मजबूत और सर्वमान्य दलित चेहरे की तलाश कमलेश पासवान के रूप में पूरी कर रही है?
ऐसे देखा जाए तो.. कोई भी इसे एक नॉर्मल और शिष्टाचार मुलाकात मानेगा. लेकिन राजनीति में कुछ भी यूं ही नहीं होता. खासकर तब जब चुनाव पास आ रहे हों या संगठन के भीतर बड़ी रणनीतियां बन रही हों. उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक की अहमियत किसी से छिपी नहीं है. राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दलित समुदाय से आता है. ऐसे में इतने बड़े दिग्गजों का एक केंद्रीय मंत्री के घर पर जुटना केवल चाय-नाश्ते तक सीमित नहीं हो सकता. इसके सीधे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. माना जा रहा है कि बीजेपी आने वाले समय में कमलेश पासवान को पूर्वांचल ही नहीं.. पूरे यूपी में एक बड़े दलित नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने की प्लानिंग कर रही है.
कमलेश पासवान कोई रातों-रात बने नेता नहीं हैं. उन्होंने जमीन पर मेहनत करके अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो समझ आता है कि पार्टी उन पर इतना भरोसा क्यों कर रही है. शुरुआती दौर की बात करें तो वह एक बार विधायक रह चुके हैं और उन्होंने बहुत कम उम्र में ही क्षेत्र की राजनीति में अपनी पकड़ बना ली थी.
गोरखपुर की बांसगांव (सुरक्षित) लोकसभा सीट से वह लगातार 4 बार सांसद चुने जा चुके हैं. लगातार चार बार चुनाव जीतना अपने आप में यह साबित करता है कि जनता के बीच उनका कनेक्ट कितना गहरा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल (Modi 3.0) में उन्हें केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई. यह सफर दिखाता है कि कमलेश पासवान ने हर स्तर पर खुद को साबित किया है. पूर्वांचल के दलित समुदाय के बीच उनकी पकड़ बहुत मजबूत है और वह एक ऐसे नेता माने जाते हैं जो आसानी से हर वर्ग के कार्यकर्ता से जुड़ जाते हैं.
उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का रास्ता काफी हद तक पूर्वांचल से होकर गुजरता है. पूर्वांचल में जातियों का समीकरण बहुत जटिल है. यहां दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. पिछले कुछ सालों में यूपी का सियासी माहौल काफी बदला है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के घटते जनाधार के बाद, दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा इधर-उधर शिफ्ट हुआ है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन भी इस वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रहा है. ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपने दलित आधार को और मजबूत करे. पार्टी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जो ना क्षेत्र में लोकप्रिय होने के साथ-साथ पूरे प्रदेश में दलित समाज को एक साफ संदेश दे सके. कमलेश पासवान इस कसौटी पर बिल्कुल खरे उतरते दिखते हैं.
गोरखपुर की इस हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद कयासों का बाजार गर्म है. चर्चाएं हैं कि आने वाले समय में कमलेश पासवान को संगठन या प्रदेश स्तर पर कोई बहुत बड़ी भूमिका दी जा सकती है. क्या उन्हें 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों के लिए दलित समाज को साधने का मुख्य जरिया बनाया जाएगा? क्या पार्टी उन्हें पूरे राज्य में रैलियाँ करने और कैडर को एकजुट करने का काम सौंपेगी? फिलहाल इन सब सवालों के आधिकारिक जवाब मिलने बाकी हैं. लेकिन इतना तय है कि बीजेपी का टॉप लीडरशिप उनसे काफी प्रभावित है और उनके कद को लगातार बड़ा किया जा रहा है.
कमलेश पासवान का बढ़ता कद बीजेपी के लिए कई मायनों में फायदेमंद साबित हो सकता है. एक जमीन से उठे और 4 बार के सांसद को तवज्जो मिलने से बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है. विपक्षी दल अक्सर बीजेपी पर दलित नेतृत्व को पीछे रखने का आरोप लगाते हैं. कमलेश पासवान को आगे करके बीजेपी इस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती है. पूर्वांचल में बीजेपी अपने आधार को और ज्यादा मजबूत कर पाएगी, जिसका फायदा सीधे तौर पर आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकता है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता हमेशा से सत्ता की कुंजी रहे हैं. खासकर पूर्वांचल के इलाके में.. जहां का सामाजिक और जातीय समीकरण राज्य की सियासत की दिशा तय करता है. वहां दलित राजनीति का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है.