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Nobel Peace Prize Winner Navi Pillay: क्या एक लॉ डिग्री सिर्फ मुकदमों की पैरवी तक सीमित है या ये पूरी दुनिया की न्याय प्रणाली को बदलने का जरिया बन सकती है? 1960 के दशक में जब दक्षिण अफ्रीका के कोर्ट रूम में रंगभेद के कारण एक महिला वकील को जज के केबिन में जाने तक की इजाजत नहीं थी, तब उन्होंने न सिर्फ शहर की पहली महिला लॉ फर्म खोली, बल्कि नेल्सन मंडेला जैसी हस्तियों का केस लड़कर इतिहास रच दिया.
आज वो पूरी दुनिया भर में सिर्फ पहली महिला लॉ फर्म बनाने वाली महिला या पहली जज के तौर पर नहीं, बल्कि 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता के रूप में भी प्रसिद्ध हैं. दरअसल हम नोबेल विजेता नवी पिल्लई की बात कर रहे हैं, जिनका करियर ग्राफ हर लॉ स्टूडेंट और यंग लॉयर के लिए एक मुकम्मल केस स्टडी है.
साल 2026 के प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान किया गया और इस बार ये बड़ा सम्मान भारतीय मूल की नावी पिल्लई को देने का निर्णय लिया गया है. नार्वेजियन नोबेल समिति द्वारा दुनिया भर में शांति को बढ़ावा देने में नावी पिल्लई के योगदान के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा. इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने से लेकर मानवाधिकारों की रक्षा करने तक के लिए जाना जाता है.
BREAKING NEWS The Norwegian Nobel Committee has decided to award the 2026 #NobelPeacePrize to Navanethem “Navi” Pillay for her efforts to promote peace and international law. #NobelPrize https://t.co/97vurspw6z
— The Nobel Prize (@NobelPrize) October 9, 2026
नवी पिल्लई की पढ़ाई-लिखाई की अगर बात करें तो उन्हें कानून के क्षेत्र में दुनिया की सबसे उच्च शिक्षित हस्तियों में से एक माना जाता है. उन्होंने साल 1963 में दक्षिण अफ्रीका के नाटाल विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की थी. इसके बाद उन्होंने इसी यूनिवर्सिटी से 1965 में बैचलर ऑफ लॉ की पढ़ाई की. आगे मास्टर की पढ़ाई के लिए वो अमेरिका स्थित हार्वर्ड लॉ स्कूल चली गईं, यहां से उन्होंने 1982 में मास्टर ऑफ लॉ की डिग्री हासिल की. 1988 में इसी यूनिवर्सिटी से डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की पढ़ाई की.
हार्वर्ड लॉ स्कूल से नवी पिल्लई ने डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस की डिग्री हासिल करने के साथ ही इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया. दरअसल, वो कानून में डॉक्टरेट करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक हैं. सिर्फ ये ही नहीं, उनका शैक्षणिक और न्यायिक करियर उपलब्धियों और रिकॉर्ड्स से भरा रहा है.
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नवी पिल्लई ने भेदभाव को ही अपनी ताकत बनाकर 1967 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन (नटाल प्रांत) में पहली लॉ फर्म की शुरुआत की थी. वो वहां पर कानून की प्रैक्टिस करने वाली पहली नॉन-वाइट महिला वकील भी बनीं और उन्हें रंगभेद कानून के दौर में अश्वेत वकील होने के नाते जजों के चैंबर में जाने की इजाजत नहीं थी. हालांकि, इसके बावजूद भी उन्होंने निडरता से काम किया और नेल्सन मंडेला सहित कई एंटी-अपारथाइड कार्यकर्ताओं का मुकदमा लड़ा और जेल में बंद राजनीतिक कैदियों के मानवीय अधिकारों के लिए आवाज भी उठाई.
1995 में रंगभेद के अंत के बाद जब नेल्सन मंडेला राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने नवी पिल्लई को दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट की पहली अश्वेत महिला जज के तौर पर नियुक्त किया. उस दौरान वो रवांडा नरसंहार के लिए बने इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल (ICTR) की पहली जज बनीं. उन्होंने इस पद पर रहते हुए एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने पूरी दुनिया की कानूनी परिभाषा बदल दी. उन्होंने अपने ऐतिहासिक फैसले में ये साबित किया कि युद्ध या हिंसा के दौरान होने वाला बलात्कार सिर्फ एक व्यक्तिगत अपराध नहीं है, बल्कि ये 'नरसंहार' और वॉर क्राइम का ही एक हिस्सा है. दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय कानूनों और ट्रिब्यूनल्स में इस फैसले को एक ऐतिहासिक मिसाल माना जाता है.
वो अपने करियर में जज के बाद संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर भी रहीं हैं. वो लॉ ग्रेजुएट्स के लिए इसलिए भी एक मिसाल बनी हैं क्योंकि उन्होंने ये साबित किया है कि वकालत सिर्फ कॉर्पोरेट कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि कानून का असली मकसद समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को न्याय दिलाना होता है. डरबन की एक छोटी सी लॉ फर्म से शुरू हुआ सफर पहली जज, UN और नोबेल शांति पुरस्कार तक पहुंचा, जो ये साबित करता है कि लीगल करियर में सफलता एक रात में नहीं, बल्कि दशकों के समर्पण से मिलती है.